“রাশি রাশি ভারা ভারা ধান কাটা হয়েছে, কে নিবে, কে নিবে, মোর সোনার ধান॥”
ढेरों-ढेर, बोरियों-भर धान काट लिया गया है। कौन लेगा, कौन लेगा, मेरा सुनहरा धान?
यह पंक्तियाँ रवींद्रनाथ टैगोर की कविता 'सोनार तरी' से ली गई हैं। इनमें एक किसान की दुविधा को दर्शाया गया है। कल्पना कीजिए कि ढेर सारा, अथाह सुनहरे धान काट लिया गया है। इतनी प्रचुरता को देखकर वक्ता पूछता है, 'कौन लेगा, कौन लेगा, मेरे इस सुनहरे धान को?' यह रचना या उपलब्धि के आनंद को खूबसूरती से दर्शाता है, जिसके तुरंत बाद इसे संरक्षित करने या इसके मूल्य को पहचानने और आगे ले जाने वाले व्यक्ति को खोजने की चिंता होती है। यह जीवन के प्रयासों की क्षणभंगुर प्रकृति और उन्हें अमर बनाने की इच्छा का मार्मिक प्रतिबिंब है।
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