গগনে গরজে মেঘ, ঘন বরষা। কূলে একা বসে আছি, নাহি ভরসা॥

“গগনে গরজে মেঘ, ঘন বরষা। কূলে একা বসে আছি, নাহি ভরসা॥”

— रवींद्रनाथ टैगोर
अर्थ

गगन में बादल गरज रहे हैं, घनघोर वर्षा हो रही है। मैं किनारे पर अकेला बैठा हूँ, कोई आशा नहीं है।

विस्तार

यह सुंदर दोहा एकाकीपन और निराशा की एक मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करता है। यह ऐसे दृश्य का वर्णन करता है जहाँ आसमान गरजते बादलों और घनी, मूसलाधार बारिश से भरा है। इस शक्तिशाली प्राकृतिक दृश्य के बीच, वक्ता नदी किनारे या तट पर अकेला बैठा है। "नाहि भरसा" पंक्ति उस पल में महसूस की गई गहरी निराशा और असहायता की भावना को खूबसूरती से व्यक्त करती है। यह केवल बाहरी तूफान के बारे में नहीं है; यह एक आंतरिक उथल-पुथल को दर्शाता है, एक ऐसी भावना जहाँ मानसून की भव्यता के बावजूद, दूर-दूर तक कोई सांत्वना या भरोसा नहीं है। यह एक विशाल, उदासीन दुनिया के सामने व्यक्तिगत दुःख का सामना करने के सार्वभौमिक मानवीय अनुभव को जागृत करता है।

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