ग़ज़ल

সোনার তরী

سنہری کشتی

घनघोर वर्षा के बीच, एक अकेला किसान नदी के किनारे बैठा है। एक सुनहरी नाव आती है और उसके काटे हुए 'सोने जैसे धान' को ले जाती है, पर उसे अकेला ही छोड़ देती है। यह कविता जीवन की क्षणभंगुरता, कलाकार की विरासत और उसके कार्य से व्यक्ति के अलगाव को दर्शाती है।

वीडियो · रवींद्रनाथ टैगोर
वीडियो देखें →
गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
গগনে গরজে মেঘ, ঘন বরষা। কূলে একা বসে আছি, নাহি ভরসা॥
गगन में बादल गरज रहे हैं, घनघोर वर्षा हो रही है। मैं किनारे पर अकेला बैठा हूँ, कोई आशा नहीं है।
2
রাশি রাশি ভারা ভারা ধান কাটা হয়েছে, কে নিবে, কে নিবে, মোর সোনার ধান॥
ढेरों-ढेर, बोरियों-भर धान काट लिया गया है। कौन लेगा, कौन लेगा, मेरा सुनहरा धान?
3
এ-পারে আমার ঠাঁই নাই, ঐ নৌকায় চড়িব, সোনার তরী আইল, ধান নিল— আমায় নিল না॥
इस पार मेरी जगह नहीं है, मैं उस नाव पर चढ़ूँगा। सुनहरी नाव आई, उसने धान ले लिया, पर मुझे नहीं लिया।
4
শূন্য নদীর তীরে রহিনু পড়ি, যাহা ছিল নিয়ে গেল সোনার তরী॥
मैं शून्य नदी के किनारे पड़ा रहा, सोने की नाव वह सब ले गई जो मेरे पास था।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

সোনার তরী | Sukhan AI