ज़ख़्म-ए-जिगर का मेरे है रश्क दोस्तों को मरता हूँ मैं कि ये क्यूँ क़ातिल को ढूँडते हैं

“My friends look with envy upon the wound in my heart; I die of dread—why must they search for my slayer?”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

मेरे दिल के ज़ख़्म पर मेरे दोस्तों को रश्क (ईर्ष्या) हो रहा है, और मैं इस डर से मरा जा रहा हूँ कि वे मेरे क़ातिल को क्यों ढूँढ रहे हैं।

विस्तार

इश्क़ की रिवायत में महबूब के हाथों ज़ख़्म पाना कोई मुसीबत नहीं, बल्कि एक अज़ीम रुतबा माना जाता है—यही वजह है कि शायर के दोस्त उसके इस ज़ख़्म-ए-जिगर पर रश्क (ईर्ष्या) कर रहे हैं। मगर आशिक़ की जान इस अंदेशे से निकली जा रही है कि ये दोस्त आख़िर उस क़ातिल यानी महबूब को क्यों ढूँढ रहे हैं? उसे डर है कि कहीं वे महबूब का भेद न खोल दें, या फिर उस तक पहुँचकर ख़ुद भी उसी की अदाओं के शिकार होकर इश्क़ में उसके रक़ीब (प्रतिद्वंद्वी) न बन बैठें।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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