“Heresy has been sanctified as tradition now, and the community of faith is cursed and reviled somehow.”
धर्म में नए मनगढ़ंत तौर-तरीके (बिदअत) परंपरा मान लिए गए हैं और पूरी उम्मत बदनाम व लांछित हो चुकी है।
यह शे'र समाज और कौम के नैतिक पतन पर एक गहरा दर्द बयां करता है। शायर अफ़सोस जताते हैं कि जो रस्में ग़लत, बनावटी और बेबुनियाद थीं, उन्हें आज सुन्नत या पवित्र रवायत का दर्जा दे दिया गया है। जब किसी समाज में गलत को सही मान लिया जाए, तो पूरी उम्मत अपनी पहचान और इज़्ज़त खो बैठती है और हर तरफ़ से ताने और जिल्लत झेलने पर मजबूर हो जाती है।
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