वादी ओ कोहसार में रोता हूँ ड़ाढें मार मार — मीर तक़ी मीर

वादी ओ कोहसार में रोता हूँ ड़ाढें मार मार दिलबरान-ए-शहर ने मुझ को सताया है बहुत

“Oh, I weep in the Kohasar, striking my limbs, For the beloved of the city has tormented me greatly.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

मैं कोहसार में रोता हूँ और अपने अंगों पर प्रहार करता हूँ, क्योंकि शहर की प्रियतमा ने मुझे बहुत सताया है।

विस्तार

यह शेर दिल की गहरी पीड़ा को बयां करता है। शायर कहते हैं कि वो वादी और कोहसार (घाटी और पहाड़) दोनों जगह रोते हैं, मानो उनका दर्द हर जगह महसूस किया जा सके। ये दर्द किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि 'दिलबरान-ए-शहर' से है—यानी शहर के उन लोगों से जिन्होंने उन्हें बहुत तड़पाया है। यह इश्क़ की वो उदासी है जो हर जगह महसूस होती है।

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