ग़ज़ल
याद-ए-अय्याम कि याँ तर्क-ए-शकेबाई था
याद-ए-अय्याम कि याँ तर्क-ए-शकेबाई था
यह ग़ज़ल यादों और बीते हुए समय के बारे में है, जहाँ शायर को लगता है कि हर गली और कोना यादों से भरा है। इसमें विरह की पीड़ा और तन्हाई में सब्र की गहराई को दर्शाया गया है। शायर अपनी प्रेमिका के मोहक प्रभाव और जीवन के अनुभवों का वर्णन करता है।
गीत सुनें
1
याद-ए-अय्याम कि याँ तर्क-ए-शकेबाई था
हर गली शहर की याँ कूचा-ए-रुस्वाई था
याद-ए-अय्याम कि क्या यह शंका का तर्क था, या हर गली शहर की ही अपमान का मार्ग थी।
2
इतनी गुज़री जो तिरे हिज्र में सो उस के सबब
सब्र मरहूम अजब मोनिस-ए-तन्हाई था
तुम्हारे वियोग में इतना समय बीत गया कि उस कारण मेरे सब्र (धैर्य) का क्या कहना, अकेलापन मेरा अजीब सा साथी बन गया था।
3
तेरे जल्वे का मगर रू था सहर गुलशन में
नर्गिस इक दीदा-ए-हैरान तमाशाई था
तेरे जलवे का मगर रू था सहर गुलशन में, नर्गिस इक दीदा-ए-हैरान तमाशाई था। (अर्थ: बगीचे में तेरा सौंदर्य मनमोहक था, पर सुबह उदास थी; एक नरगिस का फूल हैरान होकर तमाशा देख रहा था।)
4
यही ज़ुल्फ़ों की तिरी बात थी या काकुल की
'मीर' को ख़ूब किया सैर तो सौदाई था
क्या यह तुम्हारे ज़ुल्फ़ों का जादू था या तुम्हारे काकुल का? जब मीर सैर पर गए, तो वे सौदाई बन गए।
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