अब आब-ए-चश्म ही है हमारा मुहीत-ए-ख़ल्क़ — मीर तक़ी मीर

अब आब-ए-चश्म ही है हमारा मुहीत-ए-ख़ल्क़ दरिया को हम ने कब का किनारे रखा लगा

“Now, the mere spring water is our beloved creation, When did we ever confine the river to the bank?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

अब हमारा प्रिय स्रोत केवल झरना ही रह गया है, जबकि हमने तो नदिया को कभी किनारे तक सीमित किया था।

विस्तार

यह शेर एक बहुत ही गहरा एहसास बयां करता है। शायर कहते हैं कि जीवन का मूल स्रोत अब कहीं बाहर की बड़ी नदियाँ नहीं हैं। हमारा अस्तित्व अब एक छोटे, निजी चश्मे (झरने) जैसा हो गया है। इसका मतलब है कि अब हमारे भाव, हमारी भावनाएं... हमारी ही अंदर की गहराई से निकल रही हैं। यह एक आत्म-निर्भर, भावनात्मक अवस्था है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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