ग़ाफ़िल न सोज़-ए-इश्क़ से रह फिर कबाब है — मीर तक़ी मीर

ग़ाफ़िल न सोज़-ए-इश्क़ से रह फिर कबाब है गर लाएहा उस आग का टक दिल को जा लगा

“Do not be careless of the fire of love, for there is still the kebab to be enjoyed; If you bring that fire to the heart, it will surely burn.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

ग़ाफ़िल न सोज़-ए-इश्क़ से रह फिर कबाब है। अगर लाएहा उस आग का टक दिल को जा लगा। इसका शाब्दिक अर्थ है कि प्रेम की आग से लापरवाह मत रहो, क्योंकि अभी भी कबाब खाने को बाकी है; अगर उस आग को दिल में लाओगे, तो वह ज़रूर जल जाएगा।

विस्तार

यह शेर गहरे इश्क़ के दर्द पर एक चेतावनी है। मिर्ज़ा तक़ी मीर हमें आगाह करते हैं कि बस इश्क़ के दर्द से बेखबर रहना भी एक सज़ा है। शायर कहते हैं कि अगर आपने उस पुरानी आग को फिर से दिल में जलाया.... तो उसका जलना निश्चित है। यह दर्द की उस सच्चाई को बयां करता है, जहाँ से कोई बच नहीं सकता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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