जानी न क़द्र उस गुहर शब चराग़ की — मीर तक़ी मीर

जानी न क़द्र उस गुहर शब चराग़ की दिल रेज़ा-ए-ख़ज़फ़ की तरह मैं उठा दिया

“I did not appreciate the gem-like lamp, O heart; I raised it up like broken pottery.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

हे मन, मैंने उस रत्न-जैसे दीपक का मोल नहीं जाना; मैंने उसे टूटे बर्तन की तरह उठा दिया।

विस्तार

यह शेर उस दर्द को बयान करता है जब हमारी भावनाओं को कोई इंसान महत्व नहीं देता। 'गुहर शब चराग़' एक अनमोल, बेशकीमती चीज़ है, जो हमारे दिल की गहराई को दर्शाती है। लेकिन जब सामने वाला इस अनमोल चीज़ को 'रेज़ा-ए-ख़ज़फ़' (मिट्टी के बर्तन) की तरह उठा देता है, तो लगता है कि हमारे एहसास का कोई मोल नहीं। शायर कहते हैं कि हमारे दिल को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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