ग़ज़ल
न इक याक़ूब रोया इस अलम में
न इक याक़ूब रोया इस अलम में
यह ग़ज़ल बताती है कि किसी के ग़म या दुख से कोई भी आँसू नहीं बहा सकता, क्योंकि वह दर्द और निराशा के गहरे सागर में डूब चुका है। शायर कहता है कि अब उसकी नज़रों में कोई भी चीज़ उसे आकर्षित नहीं कर सकती। यह ग़ज़ल 'मीर' के माध्यम से प्रेम के गहरे अनुभव और कलात्मक कौशल की बात करती है।
गीत सुनें
1
न इक याक़ूब रोया इस अलम में
कुआँ अंधा हुआ यूसुफ़ के ग़म में
न एक याक़ूब ने इस आलम में रोया, कुआँ यूसुफ़ के ग़म में अंधा हुआ।
2
कहूँ कब तक दम आँखों में है मेरी
नज़र आवे ही-गा अब कोई दम में
मेरे नयनों में अब कितना जीवन शेष है, यह बताओ; क्योंकि मेरी दृष्टि में अब कोई उत्साह या प्रेम नहीं बचा है।
3
दया आशिक़ ने जी तो ऐब क्या है
यही 'मीर' इक हुनर होता है हम में
दया आशिक़ ने जी तो ऐब क्या है। यह 'मीर' इक हुनर होता है हम में।
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