हों गर्म-ए-सफ़र शाम-ए-ग़रीबाँ से ख़ुशी हों ऐ सुब्ह-ए-वतन तू तो मुझे बे-वतनी है

“May the evening of the stranger be joyful, with the warmth of the journey; oh morning of the homeland, you are to me a feeling of exile.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

सफ़र की गर्मी से, परदेसी की शाम को ख़ुशी मिले; ऐ वतन की सुबह, तू तो मुझे बे-वतनपन लगता है।

विस्तार

यह शेर विस्थापन और अपनेपन के गहरे दर्द को बयान करता है। शायर कहते हैं कि यात्रा की गरमी, यानी संघर्ष में जो खुशी मिलती है, वो किसी परदेसी शाम की खुशी से कहीं ज़्यादा अच्छी हो। लेकिन दूसरी लाइन में दर्द का सार है—वो वतन की सुबह भी, मेरे लिए बे-वतन सी है। इसका मतलब है कि असली जुड़ाव कहीं खो गया है, और सफर ही एकमात्र पहचान बन गया है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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