ग़ज़ल

कुछ मौज-ए-हवा पेचाँ ऐ 'मीर' नज़र आई

कुछ मौज-ए-हवा पेचाँ ऐ 'मीर' नज़र आई

यह ग़ज़ल जीवन के क्षणभंगुर और मायावी दृश्यों का वर्णन करती है, जहाँ हर सुंदर नज़ारा एक भ्रम या अस्थायी आकर्षण लगता है। शायर 'मीर' कहते हैं कि हवा की लहरों में झाँकती हुई कोई चीज़ दिखाई दी, जो शायद बस एक अस्थायी बहार या भ्रम है। यह ग़ज़ल बताती है कि जिस चीज़ को हम सच समझते हैं, वह भी एक तस्वीर या एक क्षणिक प्रभाव मात्र है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
कुछ मौज-ए-हवा पेचाँ ऐ 'मीर' नज़र आई शायद कि बहार आई ज़ंजीर नज़र आई
कुछ हल्की हवा के झोंके पर, ऐ 'मीर', मेरी नज़र पड़ी, मानो बसंत ऋतु ने जंजीरें सजा दी हों।
2
दिल्ली के न थे कूचे औराक़-ए-मुसव्वर थे जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आई
दिल्ली की गलियाँ किसी चित्रकार के पन्नों जैसी थीं; जो भी रूप दिखाई दिया, वह एक तस्वीर जैसा लगा।
3
मग़रूर बहुत थे हम आँसू की सरायत पर सो सुब्ह के होने को तासीर नज़र आई
हम आँसुओं के पड़ाव पर बहुत घमंडी थे, लेकिन आने वाली सुबह का असर दिखाई दिया।
4
गुल-बार करे हैगा असबाब-ए-सफ़र शायद ग़ुंचे की तरह बुलबुल दिल-गीर नज़र आई
शायद गुल-बार (फूलों का बगीचा) में सफर का सामान रखा है; गूँजे की तरह बुलबुल की दिल-मोहक नज़र दिखाई दी।
5
उस की तो दिल-आज़ारी बे-हेच ही थी यारो कुछ तुम को हमारी भी तक़्सीर नज़र आई
यार, उसका दिल-आज़ारी तो बे-हेच ही थी, और तुम्हें हमारी तक़्सीर भी नज़र आई।
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