कुछ मौज-ए-हवा पेचाँ ऐ 'मीर' नज़र आई — मीर तक़ी मीर
कुछ मौज-ए-हवा पेचाँ ऐ 'मीर' नज़र आई
शायद कि बहार आई ज़ंजीर नज़र आई
“On some playful breeze, O Mir, my gaze fell, As if the season of spring had brought chains to dwell.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
कुछ हल्की हवा के झोंके पर, ऐ 'मीर', मेरी नज़र पड़ी, मानो बसंत ऋतु ने जंजीरें सजा दी हों।
विस्तार
यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर ने जीवन की एक बहुत गहरी सच्चाई को बयां किया है। शायर कहते हैं कि कभी-कभी हवा की एक हल्की सी लहर भी हमें धोखा दे जाती है। उन्हें लगता है कि शायद बहार का आना भी किसी आज़ादी की निशानी नहीं है, बल्कि यह ज़ंजीर बनकर आया है। यह शेर हमें सिखाता है कि सुंदरता और खुशी के पीछे भी कोई बंधन छिपा हो सकता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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