ग़ज़ल

जफ़ाएँ देख लियाँ बेवफ़ाइयाँ देखीं

जफ़ाएँ देख लियाँ बेवफ़ाइयाँ देखीं

यह ग़ज़ल महबूब की क्रूरता और बेवफ़ाई के अनुभव को दर्शाती है। शायर कहता है कि उसने महबूब की सारी बुराइयाँ और कष्ट झेल लिए हैं, और यहाँ तक कि उसकी गली से गुज़रती हज़ारों राहों की रौनक भी देख ली है। वह बताता है कि जिसे उसने अपनी नज़रों से देखा, वह एक आतिश-बाज़ बच्चा था, और उसने अपने चेहरे पर उड़ती हवाओं का एहसास किया है, साथ ही दोस्तों से बिछड़ने का दर्द भी सहा है।

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लिपि व अर्थ
1
जफ़ाएँ देख लियाँ बेवफ़ाइयाँ देखीं भला हुआ कि तिरी सब बुराइयाँ देखीं
हमने जफ़ाएँ देख लीं और बेवफ़ाइयाँ भी देखीं; क्या बेहतर होता कि हमने तुम्हारी सारी बुराइयाँ न देखी होती।
2
तिरी गली से सदा ऐ कशंदा-ए-आलम हज़ारों आती हुई चारपाइयाँ देखीं
हे संसार के हार, तुम्हारी गली से मैंने हज़ारों आती हुई चारपाइयाँ देखीं।
3
गया नज़र से जो वो गर्म तिफ़्ल-ए-आतिश-बाज़ हम अपने चेहरे पे उड़ती हवाइयाँ देखीं
गया नज़र से जो वो गर्म तिफ़्ल-ए-आतिश-बाज़, हमने तो बस अपने चेहरे पर उड़ती हवाइयाँ देखीं।
4
तिरे विसाल के हम शौक़ में हों आवारा अज़ीज़ दोस्त सभों की जुदाइयाँ देखीं
तुम्हारे मिलन के शौक़ में मैं आवारा हूँ, मेरे प्यारे दोस्त, मैंने सब की जुदाई देखी है।
5
हमेशा माइल-ए-आईना ही तुझे पाया जो देखीं हम ने यही ख़ुद-नुमाईयाँ देखीं
सिर्फ़ आईने जैसी परछाई ने ही तुम्हें पाया, जो हमने देखीं वे सब स्वयं की पहचान ही थीं।
6
शहाँ कि कोहल-ए-जवाहर थी ख़ाक-ए-पा जिन की उन्हीं की आँखों में फिरते सलाइयाँ देखीं
जहाँ पहले जवाहरात जैसा काजल था, वहाँ अब पाँव की धूल थी; उन्हीं आँखों में मैंने फिर से कंगन घूमते देखे।
7
बनी न अपनी तो उस जंग-जू से हरगिज़ 'मीर' लड़ाईं जब से हम आँखें लड़ाइयाँ देखीं
अर्थात, मैं उस संघर्ष को कभी नहीं छोडूंगा, जब से हमारी आँखों ने लड़ाइयों का अनुभव किया है।
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