ग़ज़ल
इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा
इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा
यह ग़ज़ल बताती है कि इश्क़ (प्रेम) कितना कष्टदायक होता है। वक्ता कहता है कि तमाम सुख-सुविधाएँ और महफिलें महज़ एक चेहरे के मोहताज थीं, और वह हर हाल में उस चेहरे की ओर ही खिंचा चला गया। यह ग़ज़ल उस प्रेम की विडंबना को दर्शाती है जो दूरी के बावजूद वक्ता को जीने पर मजबूर करता है, और जिसे वह बार-बार पाना चाहता है, भले ही वह वक्ता के लिए हानिकारक हो।
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1
इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा
आख़िर अब दूरी में जी जाता रहा
इश्क़ ने क्या-क्या मुसीबतें दी हैं, कि अंत में तो मैं दूरी में ही जीवन बिताता रहा।
2
मेहर ओ मह गुल फूल सब थे पर हमें
चेहरई चेहरा ही वो भाता रहा
मेहर, महक, गुल और फूल सब थे, पर हमें तो बस उसका चेहरा ही भाता रहा।
3
दिल हुआ कब इश्क़ की रह का दलील
मैं तो ख़ुद गुम ही उसे पाता रहा
मेरा दिल कब इश्क़ के रास्ते का सबूत बन गया? मैं तो खुद ही उसमें खोया रहता रहा।
4
मुँह दिखाता बरसों वो ख़ुश-रू नहीं
चाह का यूँ कब तलक नाता रहा
बरसों से उसका चेहरा दिख रहा, पर वह प्रिय नहीं है; यह चाह का रिश्ता और कब तक रहेगा।
5
कुछ न मैं समझा जुनून ओ इश्क़ में
देर नासेह मुझ को समझाता रहा
मैंने जुनून और इश्क़ को समझा नहीं, जबकि तुम मुझे देर तक समझाते रहे।
6
दाग़ था जो सर पे मेरे शम्अ साँ
पाँव तक मुझ को वही खाता रहा
मेरे सिर पर जो दाग था, हे मोमबत्ती, वह मुझे पाँव तक खाता गया।
7
कैसे कैसे रुक गए हैं 'मीर' हम
मुद्दतों मुँह तक जिगर आता रहा
मीर ने पूछ रहे हैं कि वे किस तरह रुक गए हैं, और उनका हृदय का उत्कंठा (या याद) कई समय से उनके होंठों तक आता जा रहा है।
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