याँ बुलबुल और गुल पे तो इबरत से आँख खोल — मीर तक़ी मीर

याँ बुलबुल और गुल पे तो इबरत से आँख खोल गुल-गश्त सरसरी नहीं उस गुलिस्तान का

“The nightingale opened its eyes with adoration for the rose, For the garden of roses is not merely for a casual stroll.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

यहाँ बुलबुल और गुल पर तो इबादत से आँख खोल, गुल-गश्त सरसरी नहीं उस गुलिस्तान का।

विस्तार

यह शेर हमें जीवन को एक गहरे नज़रिए से देखने की सीख देता है। शायर कहते हैं कि न सिर्फ़ बुलबुल और फूलों को देखना है, बल्कि उन्हें इबरत से देखना है। मतलब, सिर्फ़ देखना नहीं, बल्कि उनमें जीवन का सार ढूँढना है। यह हमें सिखाता है कि कोई भी सफर, कोई भी नज़ारा, सरसरी निगाह से नहीं देखा जा सकता। हर चीज़ में एक गहराई होती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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