ग़ज़ल

अश्क आँखों में कब नहीं आता

अश्क आँखों में कब नहीं आता

यह ग़ज़ल बताती है कि आँख से आँसू का निकलना कोई अनिश्चित घटना है; यह तब नहीं आता जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, और कब आता है, यह भी निश्चित नहीं है। वक्ता कहता है कि जब वह (प्रिय) आता है, तब आँसू नहीं आते, जबकि जब वह दूर होता है, तब आँसू आ जाते हैं। ग़ज़ल में हिज्राँ (विरह) का सब्र और मन से विदा हुई इच्छाओं के बिना आँसू बहने की बात कही गई है।

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लिपि व अर्थ
1
अश्क आँखों में कब नहीं आता लोहू आता है जब नहीं आता
आँखों में आँसू कब नहीं आते, लहू आता है जब नहीं आता।
2
होश जाता नहीं रहा लेकिन जब वो आता है तब नहीं आता
मेरा होश नहीं रहता, लेकिन जब वह आता है, तब नहीं आता।
3
सब्र था एक मोनिस-ए-हिज्राँ सो वो मुद्दत से अब नहीं आता
सब्र था एक महबूब-ए-हिज्र, जो बहुत समय से अब नहीं आता।
4
दिल से रुख़्सत हुई कोई ख़्वाहिश गिर्या कुछ बे-सबब नहीं आता
दिल से कोई ख़्वाहिश दूर हुई है, इसलिए बिना किसी कारण के आँसू आ रहे हैं।
5
इश्क़ को हौसला है शर्त अर्ना बात का किस को ढब नहीं आता
इश्क़ के पास हिम्मत है, शर्त यह है कि उसे स्वीकार किया जाए। बात का किस को छिपाना या ढकना नहीं आता।
6
जी में क्या क्या है अपने ऐ हमदम पर सुख़न ता-ब-लब नहीं आता
हे हमदम, मेरे अंदर क्या-क्या है, पर शब्दों की इच्छा नहीं होती।
7
दूर बैठा ग़ुबार-ए-'मीर' उस से इश्क़ बिन ये अदब नहीं आता
दूर बैठे मिर्ज़ा ग़ालिब के ग़ज़ल के असर से, यह शिद्दत का नज़ाकत भरा अंदाज़ नहीं आ सकता।
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अश्क आँखों में कब नहीं आता | Sukhan AI