ग़ज़ल
इब्तिदा से हम ज़ईफ़ ओ ना-तवाँ पैदा हुए
ابتدا سے ہم ضعیف و ناتواں پیدا ہوئے
यह ग़ज़ल मानव जीवन की जन्मजात दुर्बलता, नश्वरता और दुखों का मार्मिक चित्रण करती है। इसके साथ ही, यह विनम्रता और ख़ाकसारी के महत्व को उजागर करती है जिसके माध्यम से इंसान रूहानी बुलंदी और महानता प्राप्त करता है।
Source: rekhta · HI
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1
इब्तिदा से हम ज़ईफ़ ओ ना-तवाँ पैदा हुए
उड़ गया जब रंग रुख़ से उस्तुख़्वाँ पैदा हुए
हम शुरुआत से ही कमज़ोर और लाचार पैदा हुए थे; जब चेहरे की रंगत उड़ गई, तब जाकर हमारी हड्डियाँ दिखाई देने लगीं।
2
ख़ाकसारी ने दिखाईं रिफ़अ'तों पर रिफ़अतें
इस ज़मीं से वाह क्या क्या आसमाँ पैदा हुए
विनम्रता ने ऊँचाइयों पर ऊँचाइयाँ दिखाई हैं, और आश्चर्य है कि इस ज़मीन से कैसे-कैसे ऊँचे आसमान पैदा हुए हैं।
3
इल्म ख़ालिक़ का ख़ज़ाना है मियान-ए-काफ़-ओ-नून
एक कुन कहने से ये कौन-ओ-मकाँ पैदा हुए
सृष्टिकर्ता का ज्ञान 'काफ़' और 'नून' अक्षरों के बीच का ख़ज़ाना है; सिर्फ़ एक बार 'कुन' (हो जा) कहने से यह पूरी कायनात और संसार अस्तित्व में आ गए।
4
ज़ब्त देखो सब की सुन ली और कुछ अपनी कही
इस ज़बाँ-दानी पर ऐसे बे-ज़बाँ पैदा हुए
हमारा संयम देखिए कि हमने सबकी बात सुन ली और अपनी बहुत कम कही; भाषा और बोलने की इतनी समझ होने के बावजूद हम ऐसे बेजुबान साबित हुए।
5
शोर-बख़्ती आई हिस्से में उन्हीं के वा नसीब
तल्ख़-कामी के लिए शीरीं-ज़बाँ पैदा हुए
हाय री बदकिस्मती कि दुर्भाग्य उन्हीं लोगों के हिस्से में आया; ऐसा लगता है कि मीठी बातें करने वाले सिर्फ दुख और कड़वाहट झेलने के लिए ही पैदा हुए थे।
6
एहतियात-ए-जिस्म क्या अंजाम को सोचो 'अनीस'
ख़ाक होने को ये मुश्त-ए-उस्तुख़्वाँ पैदा हुए
अनीस, इस शरीर की इतनी हिफ़ाज़त क्यों करनी, अपने अंजाम के बारे में सोचो। हड्डियों की यह मुट्ठी (शरीर) तो केवल ख़ाक में मिलने के लिए ही पैदा हुई है।
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