ग़ज़ल
कबीर संग्रह 91-95
کبیر سنگرہ 91-95
कबीर के ये पद बताते हैं कि ईश्वर भीतर ही निवास करता है, उसे बाहर खोजना व्यर्थ है, जैसे कस्तूरी मृग अपनी ही सुगंध से अनजान रहता है। ये भवसागर पार करने के लिए कथा-कीर्तन को एकमात्र उपाय बताते हैं और इस नश्वर जीवन को साधुओं की सेवा या गोविंद के गुणगान में लगाने का आग्रह करते हैं, जिससे मन की व्यापक शक्ति आध्यात्मिक उपलब्धि में प्रयुक्त हो।
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1
तेरा साँई तुझमें , ज्यों पहुपन में बास। कस्तूरी का हिरन ज्यों , फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास॥
तुम्हारा सांगा (ईश्वर) तुझमें ही है, जैसे कस्तूरी की सुगंध में युवा हिरण होता है, वैसे ही वह बार-बार घास खोजता रहता है।
2
कथा-कीर्तन कुल विशे , भवसागर की नाव। कहत कबीरा या जगत में नाहि और उपाव॥
कथा-कीर्तन के कुल विशेष, भवसागर की नाव। कबीर कहते हैं कि इस जगत में और कोई उपाय नहीं।
3
कबिरा यह तन जात है , सके तो ठौर लगा। कै सेवा कर साधु की , कै गोविंद गुन गा॥
कबीरा, यह शरीर जा रहा है, अगर संभव हो तो इसका ठिकाना लगा दो। साधु की सेवा और गोविंद के गुण गाने का क्या किया जा सकता है।
4
तन बोहत मन काग है , लक्ष योजन उड़ जाय। कबहु के धर्म अगम दयी , कबहुं गगन समाय॥
तन में मन का दुःख का भार ऐसा है, जैसे कौवे के पंख हो, जिसका लक्ष्य लाखों मील उड़ जाना हो। कभी धर्म का मार्ग दुर्गम होता है, और कभी आसमान में ही वह समा जाता है।
5
जहँ गाहक ता हूँ नहीं , जहाँ मैं गाहक नाँय। मूरख यह भरमत फिरे , पकड़ शब्द की छाँय॥ 99॥ कहता तो बहुत मिला , गहता मिला न कोय। सो कहता वह जान दे , जो नहिं गहता होय॥
जहाँ ग्राहक (गाहक) स्वयं मौजूद नहीं है, वहाँ मैं ग्राहक नहीं हूँ। मूर्ख यह भ्रम में भटकता रहता है, शब्द की छाया को पकड़ने की कोशिश करता है। बहुत कुछ कहने से मिला, पर कुछ भी मिल नहीं पाया। वह वह कहता है, जो कभी पकड़ा नहीं जा सकता।
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