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जहँ गाहक ता हूँ नहीं , जहाँ मैं गाहक नाँय। मूरख यह भरमत फिरे , पकड़ शब्द की छाँय॥ 99॥ कहता तो बहुत मिला , गहता मिला न कोय। सो कहता वह जान दे , जो नहिं गहता होय॥ 100॥

Where a true buyer is, I'm not,Where I would buy, no one's been got.The foolish mind in error strays,Catching but shadows of wordy ways.Many who preach, I've come across,But none who practice, to their cost.So let such speaker pass and be,Who grasps no truth, nor lives it free.

कबीर
अर्थ

जहाँ ग्राहक (गाहक) स्वयं मौजूद नहीं है, वहाँ मैं ग्राहक नहीं हूँ। मूर्ख यह भ्रम में भटकता रहता है, शब्द की छाया को पकड़ने की कोशिश करता है। बहुत कुछ कहने से मिला, पर कुछ भी मिल नहीं पाया। वह वह कहता है, जो कभी पकड़ा नहीं जा सकता।

विस्तार

कबीरदास जी यहाँ बड़ी प्यारी बात कहते हैं कि सच्चा ज्ञान सुनने वाला (ग्राहक) और देने वाला (ज्ञानी) अक्सर एक जगह नहीं मिलते। वे कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति केवल शब्दों की ऊपरी चमक में भटकता रहता है, असली मर्म को नहीं समझ पाता। उन्हें बहुत से ऐसे लोग मिले जो बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, पर उनमें से कोई भी अपने कहे को जीवन में नहीं उतारता। इसलिए कबीर हमें सीख देते हैं कि हमें ऐसे कोरी बातों के बजाय, जिसने सत्य को जिया है, उस पर ध्यान देना चाहिए।

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