लाला-ओ-गुल से तुझ को क्या निस्बत — जिगर मुरादाबादी

लाला-ओ-गुल से तुझ को क्या निस्बत ना-मुकम्मल से इस्तिआ'रे हैं

“What comparison can the tulip and the rose bear to you? They are, after all, merely imperfect metaphors.”

— जिगर मुरादाबादी

अर्थ

तुम्हारा लाला और गुलाब से क्या मुक़ाबला? वे तो तुम्हारी सुंदरता को बयां करने के लिए महज़ अधूरे रूपक (इस्तिआरे) हैं।

विस्तार

शायरी में माशूक़ के हुस्न की तुलना हमेशा से गुलाब और लाला के फूलों से की जाती रही है, लेकिन यहाँ आशिक़ इस पुरानी रिवायत को ही अधूरा बता देता है। उसका मानना है कि महबूब की खूबसूरती इतनी बेमिसाल है कि क़ुदरत के ये दिलकश फूल भी उसके सामने फीके और नाकाफ़ी लगते हैं। यह शे'र बड़ी नज़ाकत से समझाता है कि सच्चा हुस्न किसी भी उपमा या लफ़्ज़ों के दायरे से कहीं बड़ा होता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.