थोड़ी सी इजाज़त भी ऐ बज़्म-गह-ए-हस्ती आ निकले हैं दम-भर को रोना है रुलाना है

“Grant just a little respite, O banquet-hall of life; we have arrived but for a fleeting breath—to weep, and to bring others to tears.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

ऐ ज़िंदगी की महफ़िल, हमें थोड़ी सी इजाज़त या मोहलत दे दे; हम यहाँ बस एक पल के लिए आए हैं ताकि खुद रो सकें और दूसरों को भी रुला सकें।

विस्तार

शायर इस दुनिया को एक बड़ी महफ़िल की तरह देखता है, जहाँ ज़िंदगी का जश्न चल रहा है, लेकिन वह खुद को यहाँ सिर्फ़ एक पल का मेहमान मानता है। वह इस महफ़िल से बस इतनी सी मोहलत माँग रहा है कि उसे अपने हिस्से का दर्द बयाँ करने और दूसरों के साथ आंसुओं की साझेदारी करने की इजाज़त मिल जाए। यह शेर ज़िंदगी की नश्वरता और इंसान के बुनियादी रंज-ओ-ग़म को बहुत ही मार्मिक और अपनेपन के अंदाज़ में पेश करता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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