“Burn me to ashes, O pride of love's consuming flame! For those eyes have now begun to deem me worthy of pity.”
ऐ प्रेम की तपन के स्वाभिमान, मुझे जलाकर राख कर दे, क्योंकि अब महबूब की नज़रें मुझे तरस खाने के क़ाबिल समझने लगी हैं।
एक सच्चे आशिक़ के लिए महबूब का सितम सहना आसान होता है, लेकिन उसकी दया या तरस का पात्र बनना बिल्कुल नामुमकिन। यहाँ शायर अपनी मोहब्बत की आग और ख़ुद्दारी से गुज़ारिश करता है कि वह उसे जलाकर ख़ाक कर दे। जब महबूब की आँखों में तड़प या चाहत के बदले सिर्फ़ रहम नज़र आने लगे, तो एक स्वाभिमानी आशिक़ के लिए यह जिल्लत मौत से भी बदतर होती है।
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