“Breaking the foot of quest, I sit still upon the path of longing; now let me see the restless passion of the destination itself.”
मैंने चाहत की राह में अपनी खोज का पाँव तोड़ लिया है और बैठ गया हूँ; अब मुझे देखना है कि मंज़िल की अपनी बेताबी मुझे किस तरह अपनी ओर खींचती है।
यहाँ शायर ने 'तलब के पाँव' यानी अपनी सारी भागदौड़ को खुद ही तोड़कर रास्ते में बैठ जाने का बेहद खूबसूरत मंज़र खींचा है। अब तक मुसाफ़िर मंज़िल की तरफ़ दौड़ रहा था, लेकिन अब उसने अपनी कोशिशें रोक दी हैं ताकि यह देख सके कि क्या मंज़िल में भी उससे मिलने की वैसी ही तड़प है। यह हार मानने का नहीं, बल्कि इश्क़ का वो गहरा और नाज़ुक मुक़ाम है जहाँ आशिक़ चाहता है कि मोहब्बत की कशिश खुद मंज़िल को उसकी तरफ़ खींच लाए।
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