“The ascetic drank with such rare grace that the Saqi's gaze was cast his way; / Till now the drunkards had only deemed him unfit for the wine-cup's sway.”
ज़ाहिद ने शराब इतने सलीके से पी कि साक़ी की नज़रें उस पर टिक गईं, जबकि शराबी अब तक यही समझते थे कि वह शराब की महफ़िल के क़ाबिल नहीं है।
उर्दू शायरी में अक्सर 'ज़ाहिद' यानी तपस्वी को मयख़ाने के तौर-तरीक़ों से बेख़बर मानकर उसका मज़ाक उड़ाया जाता है। मगर यहाँ शायर ने इस बात को बेहद ख़ूबसूरती से उलट दिया है—जब वही ज़ाहिद जाम उठाता है, तो इतने गहरे सलीक़े और सादगी से पीता है कि साक़ी भी मुड़कर उसे देखने लगता है। यह शेर सिखाता है कि जब कोई संजीदा और नेक दिल रूहानी नशे या इश्क़ को अपनाता है, तो उसका अदब और ठहराव आम पीने वालों से कहीं बढ़कर होता है।
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