“As dark as a sigh became that very light of the eyes; did the evening of calamity manifest right from sunrise?”
जो कभी आँखों की रोशनी थी, वह एक आह की तरह अंधेरी हो गई; क्या सुबह के वक्त से ही मुसीबत की शाम का आगाज़ हो गया था?
इस शेर में शायर अपनी बदकिस्मती और गहरे रंज का दर्द बड़ी नफ़ासत से बयां कर रहे हैं। पुरानी शायरी में दिल से निकली आह को काले धुएं की तरह माना गया है, और यहाँ आँखों की प्यारी रौशनी भी उसी आह की तरह स्याह पड़ गई है। शायर लाचारी से पूछते हैं कि क्या ज़िंदगी की शुरुआत यानी सुबह से ही मुसीबतों की शाम ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था? यह शेर उस तल्ख़ अहसास को छूता है जहाँ किसी की ज़िंदगी में उम्मीद की किरण पनपने से पहले ही बुझ जाती है।
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