ग़ज़ल

ये दैर-ए-कुहन क्या है अम्बार-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक

ये दैर-ए-कुहन क्या है अम्बार-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक

यह ग़ज़ल एक रहस्यमय और जटिल प्रेम और अस्तित्व के दर्शन को प्रस्तुत करती है, जिसमें कवि एक ऐसे 'पुरानी दर' के बारे में सवाल करता है जो 'ख़स और ख़ाशाक' (मजबूत और कोमल) के भंडार जैसी है। यह इश्क़ के गहरे और जटिल अनुभवों को समझने की चुनौती बताती है, जो केवल सतही नहीं होते। अंत में, यह 'मुसलमानी' (इस्लामी/सार्वभौमिक) प्रेम के एक रहस्यमय और अलौकिक आकर्षण की ओर इशारा करती है।

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लिपि व अर्थ
1
ये दैर-ए-कुहन क्या है अम्बार-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक मुश्किल है गुज़र इस में बे-नाला-ए-आतिशनाक
ये पुराने समय का कौन सा तवायफ़खाना है, जो ख़ास और नाज़ुक चीज़ों का भंडार है? इसमें आतिश से बेहाल दिल का गुज़रना मुश्किल है।
2
नख़चीर-ए-मोहब्बत का क़िस्सा नहीं तूलानी लुत्फ़-ए-ख़लिश-ए-पैकाँ आसूदगी-ए-फ़ितराक
प्रेम की कहानी कोई लंबी गाथा नहीं है, यह तो केवल शुद्ध आनंद का सुख और आज़ादी का परमानंद है।
3
खोया गया जो मतलब हफ़्ताद ओ दो मिल्लत में समझेगा न तू जब तक बे-रंग न हो इदराक
जो मतलब खोया गया है सैंताड़-दो मिलतों में, वह तुम तब समझोगे जब तक तुम्हारा बोध रंगीन न हो जाए।
4
इक शर-ए-मुसलमानी इक जज़्ब-ए-मुसलमानी है जज़्ब-ए-मुसलमानी सिर्र-ए-फ़लक-उल-अफ़्लाक
एक मुस्लिम भावना का वार, एक मुस्लिम भावना का खिंचाव, ही आसमान और आकाशन का रहस्य है।
5
ऐ रहरव-ए-फ़रज़ाना बे-जज़्ब-ए-मुसलमानी ने राह-ए-अमल पैदा ने शाख़-ए-यक़ीं नमनाक
ऐ फ़रज़ाना प्रवाह, जो मुसलमानी जज़्ब से रहित है, ने कर्म का मार्ग बनाया और यक़ीन की शाखा को सुशोभित किया।
6
रमज़ीं हैं मोहब्बत की गुस्ताख़ी ओ बेबाकी हर शौक़ नहीं गुस्ताख़ हर जज़्ब नहीं बेबाक
मोहब्बत की गुस्ताख़ी और बेबाकी रमेज़ हैं; हर शौक़ गुस्ताख़ नहीं और हर जज़्ब बेबाक नहीं।
7
फ़ारिग़ तो न बैठेगा महशर में जुनूँ मेरा या अपना गरेबाँ चाक या दामन-ए-यज़्दाँ चाक
मेरा जुनून महशर के दिन यूँ ही नहीं बैठेगा; या तो मेरी अपनी कमर का चाक चलेगा या फिर यज़्दाँ के दामन का चाक।
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