काफ़िर है मुसलमाँ तो न शाही न फ़क़ीरी — अल्लामा इक़बाल
काफ़िर है मुसलमाँ तो न शाही न फ़क़ीरी
मोमिन है तो करता है फ़क़ीरी में भी शाही
“If a Muslim is a kafir, neither is he royal nor ascetic, But if he is a believer, even in asceticism, he is royal.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
अगर मुसलमान काफ़िर है, तो न शाही है और न फ़कीरी; पर अगर मोमिन है, तो फ़कीरी में भी शाही है।
विस्तार
यह शेर हमें इंसान के असली रुतबे और वजूद की बात सिखाता है। शायर कहते हैं कि कोई भी बाहरी ओहदा या दौलत आपको शाही नहीं बनाती। आपका असली रुतबा तो आपके ईमान में है। जब आप सच्चे मोमिन होते हैं, तो आपकी शान-ओ-शौकत कहीं बाहर नहीं, बल्कि आपके अंदर होती है। यह एक ऐसा वजूद है जो हर हाल में आपको बादशाहत दे जाता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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