ग़ज़ल

पूछ उस से कि मक़्बूल है फ़ितरत की गवाही

पूछ उस से कि मक़्बूल है फ़ितरत की गवाही

यह ग़ज़ल मनुष्य के स्वभाव और उसके कर्मों के आधार पर उसके असली स्वरूप का विश्लेषण करती है। यह बताती है कि किसी व्यक्ति का सच्चा चरित्र उसकी आस्था या पहचान से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और सिद्धांतों से झलकता है। कवि कहता है कि किसी के सच्चे स्वभाव को केवल उस व्यक्ति से पूछना चाहिए जो सबसे करीब हो।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
पूछ उस से कि मक़्बूल है फ़ितरत की गवाही तू साहिब-ए-मंज़िल है कि भटका हुआ राही
उससे पूछ कि क्या प्रकृति की गवाही स्वीकार्य है, या तुम मंज़िल के मालिक हो या भटका हुआ मुसाफ़िर।
2
काफ़िर है मुसलमाँ तो न शाही न फ़क़ीरी मोमिन है तो करता है फ़क़ीरी में भी शाही
अगर मुसलमान काफ़िर है, तो न शाही है और न फ़कीरी; पर अगर मोमिन है, तो फ़कीरी में भी शाही है।
3
काफ़िर है तो शमशीर पे करता है भरोसा मोमिन है तो बे-तेग़ भी लड़ता है सिपाही
यदि वह काफ़िर है तो वह तलवार पर भरोसा करता है; यदि वह मोमिन है तो वह बे-तेग़ (बिना नियंत्रण वाले) सिपाही की तरह लड़ता है।
4
काफ़िर है तो है ताबा-ए-तक़दीर मुसलमाँ मोमिन है तो वो आप है तक़दीर-ए-इलाही
काफ़िर होने पर वह मुसलमाँ की तक़दीर का तबा है, और मोमिन होने पर वह आप (ईश्वर) तक़दीर-ए-इलाही हैं।
5
मैं ने तो किया पर्दा-ए-असरार को भी चाक देरीना है तेरा मरज़-ए-कोर-निगाही
मैंने तो रहस्यों के पर्दे को भी चाक-देरीना है, तेरा रोग-ए-कोर-निगाह ही।
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