ग़ज़ल

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

यह ग़ज़ल आत्मा की अनंत और असीम शक्ति का वर्णन करती है, जो किसी सीमा या किनारे से बंधी नहीं है। यह बताती है कि सच्चे आत्मविश्वास और साहस के बल पर सबसे मजबूत दिखने वाले ढाँचे भी टूट सकते हैं, और व्यक्ति कठिनाइयों से गुज़रकर और भी मजबूत होकर उभरता है।

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं
खुदी वो समंदर है जिसका कोई किनारा नहीं, अगर तू इसे बस पानी समझ गया तो इसका कोई इलाज नहीं।
2
तिलिस्म-ए-गुंबद-ए-गर्दूं को तोड़ सकते हैं ज़ुजाज की ये इमारत है संग-ए-ख़ारा नहीं
तिलिस्म-ए-गुंबद-ए-गर्दूं को तोड़ा जा सकता है, क्योंकि ज़ुजाज की यह इमारत शुद्ध क्वार्ट्ज के पत्थर से नहीं बनी है।
3
ख़ुदी में डूबते हैं फिर उभर भी आते हैं मगर ये हौसला-ए-मर्द-ए-हेच-कारा नहीं
ख़ुदी में डूबकर फिर उठते हैं, लेकिन यह किसी योद्धा जैसे मर्द का हौसला नहीं है।
4
तिरे मक़ाम को अंजुम-शनास क्या जाने कि ख़ाक-ए-ज़ि़ंदा है तू ताबा-ए-सितारा नहीं
तेरे ठिकाने को तारा देखने वाला क्या जान सकता है, कि तू ज़िंदा की धूल है, तारे की राख नहीं।
5
यहीं बहिश्त भी है हूर ओ जिबरईल भी है तिरी निगह में अभी शोख़ी-ए-नज़ारा नहीं
यहीं स्वर्ग है, और हूर और जिब्रील भी हैं, पर तुम्हारी निगाह में अभी नज़ारे का शोख़ी नहीं है।
6
मिरे जुनूँ ने ज़माने को ख़ूब पहचाना वो पैरहन मुझे बख़्शा कि पारा पारा नहीं
मेरे जूनून ने ज़माने को खूब पहचाना, वो परिधान मुझे बख़्शा कि पारा पारा नहीं।
7
ग़ज़ब है ऐन-ए-करम में बख़ील है फ़ितरत कि लाल-ए-नाब में आतिश तो है शरारा नहीं
करम की आँखों में अद्भुत है कंजूसी, क्योंकि प्रिय के स्वरूप में केवल चिंगारी नहीं, बल्कि अग्नि है।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं | Sukhan AI