उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझ से हिजाब
कि मैं नसीम-ए-सहर के सिवा कुछ और नहीं
“The veil of the rose is not suitable for me; I am nothing but the gentle breeze of dawn.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
लाला का परदा मुझ पर नहीं जँचता; मैं तो सुबह की ठंडी हवा के सिवा कुछ और नहीं हूँ।
विस्तार
इस शेर में एक गहरा बिछोह और आज़ादी का एहसास है। शायर कह रहे हैं कि मैं उस महफ़िल का हिस्सा नहीं बन सकता, क्योंकि मैं तो बस सुबह की हवा हूँ। हवा तो खुली है, बहती है, उसे कोई क़ैद नहीं कर सकता। यह इश्क़ नहीं, बल्कि रूह की वो आज़ादी है जो किसी भी बंधन में नहीं आ सकती। कितना ख़ूबसूरत तसव्वुर है!
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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