ग़ज़ल

इश्क़ से पैदा नवा-ए-ज़िंदगी में ज़ेर-ओ-बम

इश्क़ से पैदा नवा-ए-ज़िंदगी में ज़ेर-ओ-बम

यह ग़ज़ल इश्क़ के रंग में रंगी एक नई ज़िंदगी के अनुभवों को दर्शाती है। इसमें बताया गया है कि कैसे इश्क़ हर चीज़ में समा जाता है, जैसे सुबह की हवा का फूल की शाख़ में होना। यह प्रेम की शक्ति और इंसान की अपनी नियति पर निर्भरता को भी समझाती है।

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लिपि व अर्थ
1
इश्क़ से पैदा नवा-ए-ज़िंदगी में ज़ेर-ओ-बम इश्क़ से मिट्टी की तस्वीरों में सोज़-ए-दम-ब-दम
इश्क़ से पैदा हुई नई ज़िंदगी में उपद्रव और धूल, इश्क़ से मिट्टी की तस्वीरों में हर पल जलता हुआ दम।
2
आदमी के रेशे रेशे में समा जाता है इश्क़ शाख़-ए-गुल में जिस तरह बाद-ए-सहर-गाही का नम
इश्क़ आदमी के हर रेशे में बस जाता है, ठीक वैसे ही जैसे सुबह की हवा की नमी फूल की टहनी में समा जाती है।
3
अपने राज़िक़ को न पहचाने तो मुहताज-ए-मुलूक और पहचाने तो हैं तेरे गदा दारा ओ जम
यदि तुम अपने मालिक को नहीं पहचानते, तो तुम राजाओं के मोहताज रहोगे; लेकिन अगर तुम उसे पहचानते हो, तो वह तुम्हारे महल का प्रिय सहारा है।
4
दिल की आज़ादी शहंशाही शिकम सामान-ए-मौत फ़ैसला तेरा तिरे हाथों में है दिल या शिकम
दिल की आज़ादी और शहंशाही के साथ मौत के सामान का बोझ, फ़ैसला तुम्हारे हाथों में है, दिल या पेट।
5
ऐ मुसलमाँ अपने दिल से पूछ मुल्ला से न पूछ हो गया अल्लाह के बंदों से क्यूँ ख़ाली हरम
ऐ मुसलमाँ, अपने दिल से पूछ, मुल्ला से न पूछ; हो गया अल्लाह के बंदों से क्यूँ ख़ाली हरम। (अर्थ: हे मुस्लिम, अपने दिल में झाँककर पूछो, और मुल्लाओं से नहीं; क्यों अल्लाह के बंदों से खाली हो गया यह पवित्र स्थान।)
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