मोहताज ख़िज़्र-ए-राह नहीं तेरी राह में — ख़्वाजा हैदर अली आतिश

मोहताज ख़िज़्र-ए-राह नहीं तेरी राह में करता है काम शौक़ हमारा दलील का

“On your path I need no Khizr to guide my straying feet; My own longing serves me as the proof that lights my way.”

— ख़्वाजा हैदर अली आतिश

अर्थ

तेरी राह में मुझे ख़िज़्र-ए-राह की ज़रूरत नहीं; मेरा शौक़ ही रहनुमा का काम कर देता है।

विस्तार

तुम्हारी राह पर चलने के लिए शायर को किसी रहनुमा की ज़रूरत नहीं है। ख़िज़्र, जो भटके हुए मुसाफ़िरों को सही रास्ता दिखाते हैं, यहाँ बिल्कुल नहीं चाहिए। क्यों? क्योंकि शायर का अपना शौक़, तुम तक पहुँचने की गहरी चाहत, ख़ुद ही रास्ता दिखाने का काम कर देती है। मोहब्बत ख़ुद राह बता देती है। जब कोई सच्चे दिल से अपने महबूब को चाहता है, तो उसे किसी और की मदद या निशानदेही नहीं चाहिए। दिल की तड़प ही दिशा बन जाती है, सीधे मंज़िल की ओर इशारा करती है। यह कहने का कितना सुंदर तरीक़ा है कि सच्ची लगन अपने भीतर ही ज्ञान और यक़ीन रखती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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