ले जाए ख़त-ए-शौक़ कबूतर ग़रीब क्या — ख़्वाजा हैदर अली आतिश
“How can a humble pigeon bear the letter of my longing there, To that high place where even Gabriel finds no station, no repair?”
अर्थ
बेचारा कबूतर प्रेम का पत्र वहाँ कैसे ले जा सकता है, उस जगह जहाँ जिब्राईल तक का कोई ठिकाना नहीं है।
विस्तार
शायर सोच रहा है कि एक छोटा-सा बेचारा कबूतर उसके प्यार भरे ख़त को उस महबूब तक कैसे पहुँचाएगा। वह जगह इतनी ऊँची और पाक है कि वहाँ तो जिब्राईल जैसे बड़े फ़रिश्ते का भी कोई मुक़ाम नहीं। जब एक फ़रिश्ता भी वहाँ नहीं पहुँच सकता, तो इस ग़रीब परिंदे की क्या बिसात। इसमें एक नरम-सी तड़प है। महबूब इतना दूर, इतना बुलंद महसूस होता है कि कोई क़ासिद वहाँ पहुँचने के क़ाबिल नहीं लगता। यह उस इश्क़ की बात है जो नामुमकिन ऊँचाइयों की तरफ़ देखता है, और उस दिल की बेबसी की, जो फिर भी अपना पैग़ाम भेजने की हिम्मत करता है।
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