आवारा हूँ मैं गोर की मंज़िल के शौक़ में — ख़्वाजा हैदर अली आतिश

आवारा हूँ मैं गोर की मंज़िल के शौक़ में रहज़न सुलूक मुझसे करेगा दलील का

“A wanderer am I, longing for the grave's abode; the highwayman will treat me with the courtesy of proof.”

— ख़्वाजा हैदर अली आतिश

अर्थ

मैं क़ब्र की मंज़िल की चाहत में भटकता फिरता हूँ; राहज़न मुझसे दलील की तरह बरताव करेगा।

विस्तार

शायर खुद को एक आवारा कहता है, जो ज़िंदगी में भटकता रहता है और दिल में एक ही गहरी चाहत रखता है — क़ब्र की मंज़िल तक पहुँचना, वही आख़िरी ठिकाना। वह इस आख़िरी घर की तलब में इतना खोया हुआ है कि उसे दुनिया की राहों या रहनुमाई की परवाह नहीं। वह सोचता है कि जो रहज़न आम तौर पर मुसाफ़िरों को लूटता है, वही उसे रास्ता दिखाने लगेगा, उसकी रहनुमाई करेगा। यह एक प्यारी तस्वीर है एक ऐसे इंसान की, जो अपनी आख़िरी मंज़िल का इतना दीवाना है कि पूरी दुनिया उसे घर की ओर इशारा करती लगती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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