कोताह याँ कमंद है क़ासिर है नर्दबान — ख़्वाजा हैदर अली आतिश
“Too short the lasso here, too weak the ladder stands; the roof of my desire is the Throne of the Glorious Lord.”
अर्थ
यहाँ कमंद छोटी पड़ती है और सीढ़ी भी अपर्याप्त है; मेरी मुराद की छत तो उस महान प्रभु का अर्श है।
विस्तार
यहाँ शायर स्वीकार करता है कि उसके साधन छोटे पड़ जाते हैं। जो कमंद वह फेंकता है, वह बहुत छोटी है, और जो सीढ़ी वह चढ़ता है, वह कमज़ोर है। क्यों? क्योंकि जिस छत तक वह पहुँचना चाहता है, वह कोई मामूली ऊँचाई नहीं। वह तो महान ईश्वर का अर्श है, जलील रब का सिंहासन है। ऐसी मंज़िल इंसानी कोशिश से बहुत ऊपर है। न कोई रस्सी, न कोई सीढ़ी, न हमारी अपनी मेहनत हमें वहाँ तक ले जा सकती है। यह एक विनम्र स्वीकृति है कि कुछ चाहतें हमारे सीमित साधनों की पहुँच से परे होती हैं, और उस शिखर पर केवल ईश्वर की भव्यता ही विराजती है।
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