कोह-ओ-सहरा-ओ-गुलिस्ताँ में फिरा करता है — ख़्वाजा हैदर अली आतिश
“Through mountains, deserts, gardens, ceaselessly it wanders on— Still seeking you, that flowing stream remains the same it was before.”
अर्थ
वह पहाड़, रेगिस्तान और बाग़ों में भटकता फिरता है; वह तेरा बहता हुआ पानी, जो पहले था, अब भी तुझे ढूँढ़ रहा है।
विस्तार
शायर एक बेचैन खोजी की तस्वीर खींचते हैं, जो हर जगह भटकता रहता है, पहाड़ों में, रेगिस्तानों में और बागों में। आख़िर वह किसकी तलाश में है? वह उस बहते पानी को ढूँढ़ रहा है, उस जीवंत धारा को, जो कभी यहाँ हुआ करती थी। एक समय था जब यहाँ कुछ पवित्र और जीवनदायी बहता था, जैसे ज़िंदगी की कोई नदी। अब वह सूख गई है या खो गई है, फिर भी खोजी हार नहीं मानता। वह भटकता रहता है, इस उम्मीद में कि उसे फिर पा ले। यह दिल की गहरी तड़प को बयान करता है, किसी खोई हुई चीज़ की तलाश, जिसने कभी जीवन को अर्थ दिया था।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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