ग़ज़ल
वुसअत-ए-सई-ए-करम देख कि सर-ता-सर-ए-ख़ाक
وسعت سعی کرم دیکھ کہ سر تا سر خاک
इस ग़ज़ल में ग़ालिब ने बेपनाह तलब, तड़प और अस्तित्व के जलते हुए रेगिस्तान का गहरा बयान किया है। वे दर्शाते हैं कि करम और इनायत की तमाम कोशिशों के बावजूद इश्क़ की जलन और रूहानी प्यास अधूरी ही रहती है, और दिल के सफ़र के छाले कभी नहीं भरते।
Source: rekhta · HI
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1
वुसअत-ए-सई-ए-करम देख कि सर-ता-सर-ए-ख़ाक
गुज़रे है आबला-पा अब्र-ए-गुहर-बार हुनूज़
कृपा और उदारता के प्रयास का विस्तार देखिए कि मोतियों की वर्षा करने वाला बादल अब भी पूरी ज़मीन पर पैरों में छाले लिए भटक रहा है।
2
यक-क़लम काग़ज़-ए-आतिश-ज़दा है सफ़्हा-ए-दश्त
नक़्श-ए-पा में है तब-ए-गर्मी-ए-रफ़्तार हुनूज़
रेगिस्तान का पूरा पन्ना एक जले हुए काग़ज़ की तरह बन गया है, फिर भी पैरों के निशान में उस तेज़ रफ़्तार की तपन अब भी बाक़ी है।
3
दाग़-ए-अतफ़ाल है दीवाना ब-कोहसार हुनूज़
ख़ल्वत-ए-संग में है नाला तलब-गार हुनूज़
पहाड़ों में दीवाना प्रेमी अब भी बच्चों के (पत्थरों के) घाव लिए हुए है, और पत्थर के एकांत में भी उसकी फ़रियाद अब भी तलबगार बनी हुई है।
4
ख़ाना है सैल से ख़ू-कर्दा-ए-दीदार हुनूज़
दूरबीं दर-ज़दा है रख़्ना-ए-दीवार हुनूज़
घर को अब भी सैलाब का नज़ारा करने की आदत है, और दीवार की दरार अब भी दूरबीन की तरह दरवाज़े की ओर नज़र लगाए हुए है।
5
आई यक-उम्र से मअज़ूर-ए-तमाशा नर्गिस
चश्म-ए-शबनम में न टूटा मिज़ा-ए-ख़ार हुनूज़
नर्गिस का फूल जीवन भर से तमाशा देखने से मजबूर और बेबस रहा है, फिर भी ओस की आँख में काँटे जैसी पलक अब तक नहीं टूटी।
6
क्यूँ हुआ था तरफ़-ए-आबला-ए-पा या-रब
जादा है वा-शुदन-ए-पेचिश-ए-तूमार हुनूज़
हे ईश्वर, (काँटा या तक़दीर) पाँव के छाले का तरफ़दार क्यों हो गया? रास्ता तो अभी भी किसी लंबे और पेचीदा पुलंदे की तरह खुलता ही जा रहा है।
7
हों ख़मोशी-ए-चमन हसरत-ए-दीदार 'असद'
मिज़ा है शाना-कश-ए-तुर्रा-ए-गुफ़्तार हुनूज़
ऐ असद! यद्यपि मैं दीदार की हसरत लिए चमन की ख़ामोशी बना हुआ हूँ, फिर भी मेरी पलकें अब तक गुफ़्तगू की ज़ुल्फ़ों को सुलझाने में लगी हैं।
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