“The desert's page is all at once a sheet consumed by fire; yet in the footprint still burns the blazing fever of that speed.”
रेगिस्तान का पूरा पन्ना एक जले हुए काग़ज़ की तरह बन गया है, फिर भी पैरों के निशान में उस तेज़ रफ़्तार की तपन अब भी बाक़ी है।
ग़ालिब यहाँ दीवानगी और इश्क़ की तपिश को एक बेहद अनोखे मंज़र में ढालते हैं। वे पूरे रेगिस्तान को एक जले हुए काग़ज़ की तरह देखते हैं, जो मुसाफ़िर के पाँव की बेपनाह गर्मी से झुलस गया है। आशिक़ तो तेज़ी से गुज़र चुका है, मगर रेत पर छूटे उसके क़दमों के निशान अब भी उसी आग और रफ़्तार के बुखार से दहक रहे हैं। यह शेर हमें बताता है कि सच्चा जुनून जहाँ से भी गुज़रता है, अपनी कभी न बुझने वाली आँच पीछे छोड़ जाता है।
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