ग़ज़ल
वाँ पहुँच कर जो ग़श आता पए-हम है हम को
واں پہنچ کر جو غش آتا پئےہم ہے ہم کو
यह ग़ज़ल प्रेम और भक्ति की अत्यधिक गहनता को दर्शाती है, जहाँ प्रेमी अपने महबूब के समीप पहुँचते ही बेहोश हो जाता है, उसके क़दमों की धूल चूमने को तरसता है। दिल और मैं दोनों वफ़ा में डूबे हुए हैं, और इस पूर्ण समर्पण तथा कमज़ोरी की अवस्था में भी आनंद पाते हैं, महबूब की गली छोड़ने में असमर्थ हैं। प्रेमी एक जानबूझकर की गई उपेक्षा के लिए विनती करता है, क्योंकि तिरस्कार भरी नज़र असहनीय है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
वाँ पहुँच कर जो ग़श आता पए-हम है हम को
सद-रह आहंग-ए-ज़मीं बोस-ए-क़दम है हम को
वहाँ पहुँचकर जो मुझे बार-बार बेहोशी आती है, वह आपके कदमों की भूमि चूमने की मेरी सौ गुना तीव्र इच्छा के कारण है।
2
दिल को मैं और मुझे दिल महव-ए-वफ़ा रखता है
किस क़दर ज़ौक़-ए-गिरफ़्तारी-ए-हम है हम को
मेरा दिल मुझे और मैं अपने दिल को वफ़ादारी में लीन रखता हूँ। हमें इस आपसी मोहपाश में बंधे रहने में कितना गहरा आनंद आता है।
3
ज़ो'फ़ से नक़्श-ए-प-ए-मोर है तौक़-ए-गर्दन
तिरे कूचे से कहाँ ताक़त-ए-रम है हम को
कमज़ोरी के कारण, चींटी का पदचिह्न भी गर्दन का बंधन बन गया है। तेरे कूचे से भागने की शक्ति हममें कहाँ है?
4
जान कर कीजे तग़ाफ़ुल कि कुछ उम्मीद भी हो
ये निगाह-ए-ग़लत-अंदाज़ तो सम है हम को
आप जानबूझकर हमें अनदेखा कीजिए ताकि कुछ उम्मीद बनी रहे। क्योंकि आपकी यह छलपूर्ण नज़र हमारे लिए विष समान है।
5
रश्क-ए-हम-तरही ओ दर्द-ए-असर-ए-बांग-ए-हज़ीं
नाला-ए-मुर्ग़-ए-सहर तेग़-ए-दो-दम है हम को
समान स्थिति की ईर्ष्या और एक दुखद विलाप के प्रभाव का दर्द; सुबह के पक्षी का रुदन हमारे लिए दोधारी तलवार के समान है।
6
सर उड़ाने के जो वा'दे को मुकर्रर चाहा
हँस के बोले कि तिरे सर की क़सम है हम को
जब मैंने अपना सिर कलम करने के वादे को बार-बार चाहा, तो वे हँसकर बोले कि हमें तुम्हारे सिर की कसम है।
7
दिल के ख़ूँ करने की क्या वजह व-लेकिन नाचार
पास-ए-बे-रौनक़ी-ए-दीदा अहम है हम को
मेरे दिल के खून करने की क्या वजह है? लेकिन मैं विवश हूँ। मुझे अपनी आँखों की बेरौनक़ी को बनाए रखना महत्वपूर्ण लगता है, ताकि दुःख प्रकट न हो।
8
तुम वो नाज़ुक कि ख़मोशी को फ़ुग़ाँ कहते हो
हम वो 'आजिज़ कि तग़ाफ़ुल भी सितम है हम को
तुम इतने नाज़ुक हो कि ख़ामोशी को भी फ़ुग़ाँ समझते हो। हम इतने विवश हैं कि तुम्हारी उपेक्षा भी हमें एक सितम लगती है।
9
लखनऊ आने का बा'इस नहीं खुलता या'नी
हवस-ए-सैर-ओ-तमाशा सो वो कम है हम को
लखनऊ आने का कारण स्पष्ट नहीं है, क्योंकि हमें घूमने और तमाशे देखने की इच्छा बहुत कम है।
10
मक़्ता-ए-सिलसिला-ए-शौक़ नहीं है ये शह्र
अज़्म-ए-सैर-ए-नजफ़-ओ-तौफ़-ए-हरम है हम को
यह शहर हमारी इच्छाओं की शृंखला का अंत नहीं है। हमारा दृढ़ संकल्प है कि हम नज़फ़ की यात्रा करें और हरम का तवाफ़ करें।
11
लिए जाती है कहीं एक तवक़्क़ो' 'ग़ालिब'
जादा-ए-रह कशिश-ए-काफ़-ए-करम है हम को
ग़ालिब, एक उम्मीद मुझे कहीं लिए जा रही है। मेरे सफ़र का रास्ता एक मेहरबान हाथ का खिंचाव है।
12
अब्र रोता है कि बज़्म-ए-तरब आमादा करो
बर्क़ हँसती है कि फ़ुर्सत कोई दम है हम को
बादल रोता है कि खुशी की महफिल तैयार करो। बिजली हंसती है कि क्या हमें पल भर की भी फुर्सत है?
13
ताक़त-ए-रंज-ए-सफ़र भी नहीं पाते उतनी
हिज्र-ए-यारान-ए-वतन का भी अलम है हम को
हमें सफ़र की मुश्किलों को सहने की उतनी ताक़त भी नहीं मिलती, और हमें वतन के दोस्तों से बिछड़ने का ग़म भी है।
14
लाई है मो'तमुद्दौला बहादुर की उमीद
जादा-ए-रह कशिश-ए-काफ़ करम है हम को
मो'तमुद्दौला बहादुर से मिली उम्मीद यह सौभाग्य लाई है; हमारे लिए रास्ते का सहारा उनके उदार हाथ का आकर्षण है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
