ग़ज़ल

सितम-कश मस्लहत से हूँ कि ख़ूबाँ तुझ पे 'आशिक़ हैं

ستم کش مصلحت سے ہوں کہ خوباں تجھ پہ عاشق ہیں
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 5 shers· radif: आख़र

यह ग़ज़ल एक प्रेमी की विरोधाभासी पीड़ा को दर्शाती है, जो महबूब के कई चाहने वालों के कारण रणनीतिक रूप से दर्द सहता है, संभावित प्रतिद्वंद्विता का अनुमान लगाते हुए। इसमें धोखेबाज आराम, प्रेमी का जाँच की वस्तु में असहाय परिवर्तन, और अत्यधिक जुनून के सामने संयम का अंतिम समर्पण जैसे विषय शामिल हैं। यह शेर प्रेम की यात्रा में एक साझा, नियत मार्ग की ओर इशारा करते हैं।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
सितम-कश मस्लहत से हूँ कि ख़ूबाँ तुझ पे 'आशिक़ हैं तकल्लुफ़-बर-तरफ़ मिल जाएगा तुझ सा रक़ीब आख़िर
मैं विवेक से यह दुख सह रहा हूँ क्योंकि कई सुंदर लोग तुम पर मोहित हैं। सच कहूँ तो, अंततः तुम्हें तुम्हारे जैसा ही एक प्रतिद्वंद्वी मिल जाएगा।
2
दिया यारों ने बे-होशी में दरमाँ का फ़रेब आख़र हुआ सकते से मैं आईना-ए-दस्त-ए-तबीब आख़र
मेरे दोस्तों ने मेरी बेहोशी में आख़िरकार उपचार का धोखा दिया। अंततः, उस स्तब्धता से मैं वैद्य के हाथ का दर्पण बन गया।
3
रग-ए-गुल जादा-ए-तार-ए-न-गह से हद मुआफ़िक़ है मिलेंगे मंज़िल-ए-उल्फ़त में हम और 'अंदलीब आख़र
फूल की रग दृष्टि के बारीक धागे से पूरी तरह से मेल खाती है। अंततः, हम और बुलबुल प्रेम के निवास स्थान में मिलेंगे।
4
ग़ुरूर-ज़ब्त वक़्त-ए-नज़अ' टूटा बे-क़रारी से नियाज़-ए-पर-फ़िशानी हो गया सब्र-ओ-शकेब आख़र
मृत्यु के क्षण में मेरा आत्म-नियंत्रण का गर्व बेचैनी से टूट गया। अंत में, सारा धैर्य और सहनशीलता एक पंख फड़फड़ाने की बेताब आवश्यकता बन गया।
5
'असद' की तरह मेरी भी बग़ैर-अज़ सुब्ह-ए-रूख़साराँ हुई शाम-ए-जवानी ऐ दिल-ए-हसरत नसीब आख़र
'असद' की तरह मेरी भी जवानी की शाम बिना सुंदर चेहरों को देखे ही आ गई। ऐ हसरत-भरे दिल, आखिरकार मेरी जवानी प्यार और सुंदरता के अनुभव के बिना ही समाप्त हो गई।
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