दिया यारों ने बे-होशी में दरमाँ का फ़रेब आख़र — मिर्ज़ा ग़ालिब

दिया यारों ने बे-होशी में दरमाँ का फ़रेब आख़र हुआ सकते से मैं आईना-ए-दस्त-ए-तबीब आख़र

“My friends, in stupor, offered a cure's deceit at last;From trance, I became the mirror in the physician's hand at last.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

मेरे दोस्तों ने मेरी बेहोशी में आख़िरकार उपचार का धोखा दिया। अंततः, उस स्तब्धता से मैं वैद्य के हाथ का दर्पण बन गया।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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