'असद' की तरह मेरी भी बग़ैर-अज़ सुब्ह-ए-रूख़साराँ — मिर्ज़ा ग़ालिब
'असद' की तरह मेरी भी बग़ैर-अज़ सुब्ह-ए-रूख़साराँ
हुई शाम-ए-जवानी ऐ दिल-ए-हसरत नसीब आख़र
“Like Asad, my own youth's eve descended,Without the dawn of fair faces, O yearning heart, at last.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
'असद' की तरह मेरी भी जवानी की शाम बिना सुंदर चेहरों को देखे ही आ गई। ऐ हसरत-भरे दिल, आखिरकार मेरी जवानी प्यार और सुंदरता के अनुभव के बिना ही समाप्त हो गई।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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