ग़ज़ल

शुमार-ए-सुब्हा मर्ग़ूब-ए-बुत-ए-मुश्किल-पसंद आया

شمارِ صبح مرغوبِ بتِ مشکل پسند آیا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: आया

यह ग़ज़ल एक ऐसे गहन और अक्सर एकतरफ़ा प्रेम को दर्शाती है जहाँ माशूक़ को एक "मुश्किल-पसंद बुत" या "क़ातिल" के रूप में चित्रित किया गया है, जिसे प्रेमी की मुश्किलों और अंतिम बलिदान में आनंद आता है। शेर माशूक़ की बेपरवाही और प्रेमी के कष्टों में उसकी खुशी को व्यक्त करते हैं, जो समर्पित प्रेमी द्वारा शाश्वत निराशा में एक विरोधाभासी स्वीकृति या यहाँ तक कि सहजता का सुझाव देते हैं। यह क्रूरता के सामने भक्ति की एक मार्मिक पड़ताल है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
शुमार-ए-सुब्हा मर्ग़ूब-ए-बुत-ए-मुश्किल-पसंद आया तमाशा-ए-ब-यक-कफ़ बुर्दन-ए-सद-दिल-पसंद आया
मेरे मुश्किल-पसंद बुत (प्रिय) को माला का गिनना पसंद आया। उसे एक हथेली में सौ दिलों को ले जाने का नज़ारा भी भाया।
2
ब-फैज़-ए-बे-दिली नौमीदी-ए-जावेद आसाँ है कुशायिश को हमारा उक़्दा-ए-मुश्किल-पसंद आया
बेदिली के कारण, शाश्वत निराशा आसान हो जाती है। हमारी समस्या, जिसे कठिनाई पसंद है, समाधान को भा गई।
3
हवा-ए-सैर-ए-गुल आईना-ए-बे-मेहरी-ए-क़ातिल कि अंदाज़-ए-ब-खूं-ग़ल्तीदन-ए-बिस्मिल-पसंद आया
बगीचे में घूमने की इच्छा हत्यारे की क्रूरता का आईना बन गई, क्योंकि उसे घायल व्यक्ति का खून में लथपथ तड़पना पसंद आया।
4
रवानी-हा-ए-मौज-ए-ख़ून-ए-बिस्मिल से टपकता है कि लुत्फ़-ए-बे-तहाशा-रफ़्तन-ए-क़ातिल-पसंद आया
बलिदान किए गए के खून की बहती लहरों से यह टपकता है, क्योंकि कातिल के बेतहाशा और बेरोकटोक चले जाने का आनंद इसे पसंद आया।
5
'असद' हर जा सुख़न ने तरह-ए-बाग़-ए-ताज़ा डाली है मुझे रंग-ए-बहार-ईजादि-ए-बे-दिल-पसंद आया
असद, मेरी शायरी ने हर जगह एक नए बाग़ की नींव डाली है। मुझे बहार पैदा करने वाला वह 'बे-दिल' अंदाज़ पसंद आया।
6
सवाद चश्म-ए-बिस्मिल इंतिख़ाब-ए-नुक़्ता आराई ख़िराम-ए-नाज़ बेपरवाई-ए-क़ातिल पसंद आया
बिस्मिल (क़ुर्बान किए गए) की आँख का कालापन, जैसे किसी चुने हुए बिंदु की सजावट हो, और कातिल की मदभरी चाल तथा उसकी बेपरवाही मुझे पसंद आई।
7
हुई जिस को बहार-ए-फ़ुर्सत-ए-हस्ती से आगाही ब-रंग-ए-लाला जाम-ए-बादा बर-महल पसंद आया
जिसे जीवन के अवसर की क्षणभंगुर बहार का ज्ञान हुआ, उसे लाली रंग का शराब का प्याला उचित समय पर पसंद आया।
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