ग़ज़ल

सरापा रेहन-ए-इश्क़-ओ-ना-गुज़ीर-ए-उल्फ़त-ए-हस्ती

سراپا رہنِ عشق و ناگزیرِ الفتِ ہستی
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: का

यह ग़ज़ल प्रेम की एक गहन और सर्वग्राही प्रकृति को खूबसूरती से व्यक्त करती है, जहाँ प्रेमी स्नेह के प्रति पूरी तरह रेहन है और अस्तित्व के सार से अविभाज्य है। यह अतृप्त इच्छा की गहरी लालसा और विरोधाभासी पीड़ा को उजागर करती है, प्रेमी को एक ऐसे किनारे के रूप में चित्रित करती है जो अपनी नदी के लिए निरंतर तरसता है। शेर बलिदान, घायल हृदय के लचीलेपन और एक रहस्यमय आत्मनिरीक्षण के विषयों पर भी प्रकाश डालते हैं, जो हृदय को एकता के एक पवित्र निवास के रूप में देखते हैं।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
सरापा रेहन-ए-इश्क़-ओ-ना-गुज़ीर-ए-उल्फ़त-ए-हस्ती 'इबादत बर्क़ की करता हूँ और अफ़्सोस हासिल का
मैं पूरी तरह से प्रेम को समर्पित हूँ और जीवन के स्नेह से बच नहीं सकता। मैं बिजली की पूजा करता हूँ और उसके परिणाम का अफ़सोस करता हूँ।
2
ब-क़द्र-ए-ज़र्फ़ है साक़ी ख़ुमार-ए-तिश्ना-कामी भी जो तू दरिया-ए-मै है तो मैं ख़म्याज़ा हूँ साहिल का
हे साक़ी, अधूरी प्यास का नशा भी अपनी क्षमता के अनुसार होता है। यदि तुम शराब की नदी हो, तो मैं किनारे का विस्तृत खिंचाव या प्यास हूँ।
3
ज़ि-बस खूँ-गश्त-ए-रश्क-ए-वफ़ा था वहम बिस्मिल का चुराया ज़ख़्म-हा-ए-दिल ने पानी तेग़-ए-क़ातिल का
पीड़ित का वहम वफ़ा की ईर्ष्या के खून में इतना डूबा हुआ था कि दिल के ज़ख़्मों ने खुद ही क़ातिल की तलवार का पानी चुरा लिया।
4
निगाह-ए-चश्म-ए-हासिद वाम ले ऐ ज़ौक़-ए-ख़ुद-बीनी तमाशाई हूँ वहदत-ख़ाना-ए-आईना-ए-दिल का
हे स्वयं को देखने के आनंद, ईर्ष्यालु आँख की दृष्टि उधार ले। मैं दिल के आईने का दर्शक हूँ, जो एकता का घर है।
5
शरर-फ़ुर्सत निगह सामान-ए-यक-आलम चराग़ाँ है ब-क़द्र-ए-रंग याँ गर्दिश में है पैमाना महफ़िल का
एक चिंगारी जैसी क्षणिक नज़र में एक पूरी दुनिया को रोशन करने की शक्ति है। यहाँ महफिल का प्याला उसके रंग या उसकी प्रकृति के अनुसार घूमता है।
6
सरासर ताख़तन को शश-जिहत यक-अर्सा जौलाँ था हुआ वामांदगी से रह-रवाँ की फ़र्क़ मंज़िल का
एक सरपट दौड़ के लिए, छहों दिशाएँ एक विशाल अखाड़ा थीं। मुसाफिरों की थकान के कारण ही मंजिल का फर्क पड़ा।
7
मुझे राह-ए-सुख़न में ख़ौफ़-ए-गुम-राही नहीं ग़ालिब असा-ए-ख़िज़्र-ए-सहरा-ए-सुख़न है ख़ामा बे-दिल का
ग़ालिब कहते हैं कि उन्हें काव्य-मार्ग में भटक जाने का कोई डर नहीं है। क्योंकि बेदिल की कलम उनके लिए काव्य के रेगिस्तान में ख़िज़्र की लाठी के समान मार्गदर्शक है।
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