मुझे राह-ए-सुख़न में ख़ौफ़-ए-गुम-राही नहीं ग़ालिब — मिर्ज़ा ग़ालिब

मुझे राह-ए-सुख़न में ख़ौफ़-ए-गुम-राही नहीं ग़ालिब असा-ए-ख़िज़्र-ए-सहरा-ए-सुख़न है ख़ामा बे-दिल का

“O Ghalib, no fear of straying holds me on the path of verse, For Be-dil's pen, in poetry's desert, is Khizr's guiding staff.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

ग़ालिब कहते हैं कि उन्हें काव्य-मार्ग में भटक जाने का कोई डर नहीं है। क्योंकि बेदिल की कलम उनके लिए काव्य के रेगिस्तान में ख़िज़्र की लाठी के समान मार्गदर्शक है।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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