ग़ज़ल
निकोहिश है सज़ा फ़रियादी-ए-बे-दाद-ए-दिलबर की
نکوہش ہے سزا فریادی بے داد دلبر کی
यह ग़ज़ल प्रेम की उस गहरी विडंबना को उजागर करती है जहाँ महबूब के सितम की फ़रियाद करने पर भी प्रेमी को केवल निंदा ही मिलती है। कवि ने इसमें इश्क़ के असीम दर्द, तड़प और प्रेमी के बेबस किंतु अटूट समर्पण को अत्यंत दार्शनिक व मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
निकोहिश है सज़ा फ़रियादी-ए-बे-दाद-ए-दिलबर की
मबादा ख़ंदा-ए-दंदाँ-नुमा हो सुब्ह महशर की
महबूब के ज़ुल्म की शिकायत करने वाले की सज़ा केवल निंदा और फटकार है, ताकि ऐसा न हो कि प्रलय (क़यामत) की सुबह उस पर दाँत दिखाकर मज़ाक उड़ाते हुए हँस पड़े।
2
रग-ए-लैला को ख़ाक-ए-दश्त-ए-मजनूँ रेशगी बख़्शे
अगर बोवे बजा-ए-दाना दहक़ाँ नोक निश्तर की
यदि किसान बीज के दाने की जगह नश्तर (चीरा लगाने वाले औज़ार) की नोक बो दे, तो मजनूँ के सहरा की धूल लैला की नस को जड़ें प्रदान कर देगी।
3
पर-ए-परवाना शायद बादबान-ए-कश्ती-ए-मय था
हुई मज्लिस की गर्मी से रवानी दौर-ए-साग़र की
शायद परवाने का पंख शराब की कश्ती का पाल बन गया था, क्योंकि महफ़िल की सरगर्मी से शराब के प्यालों का दौर तेज़ी से चलने लगा।
4
करूँ बे-दाद-ए-ज़ौक़-ए-पर-फ़िशानी अर्ज़ क्या क़ुदरत
कि ताक़त उड़ गई उड़ने से पहले मेरे शहपर की
मैं क़ुदरत के सामने उड़ने की अपनी ख़्वाहिश पर हुए ज़ुल्म की क्या शिकायत करूँ, जबकि उड़ने से पहले ही मेरे बड़े परों की ताक़त ख़त्म हो गई।
5
कहाँ तक रोऊँ उस के खे़मे के पीछे क़यामत है
मिरी क़िस्मत में या-रब क्या न थी दीवार पत्थर की
मैं कब तक उसके ख़ेमे के पीछे रोता रहूँ, यह तो क़यामत का सा अज़ाब है। हे ईश्वर, क्या मेरी क़िस्मत में रोने के लिए पत्थर की एक दीवार भी नहीं लिखी थी?
6
ब-जुज़ दीवानगी होता न अंजाम-ए-ख़ुद-आराई
अगर पैदा न करता आइना ज़ंजीर जौहर की
खुद को संवारने और देखने का अंजाम पागलपन के सिवा कुछ न होता, अगर आईना अपनी सतह के जौहर से उसे रोकने वाली ज़ंजीर पैदा न करता।
7
ग़ुरूर-ए-लुत्फ़-ए-साक़ी नश्शा-ए-बे-बाकी-ए-मस्ताँ
नम-ए-दामान-ए-इस्याँ है तरावत मौज-ए-कौसर की
साक़ी की कृपा पर भरोसा ही मतवालों की बेबाकी का नशा है; हमारे पापों के दामन की नमी वास्तव में कौसर की लहरों की ताज़गी है।
8
मिरा दिल माँगते हैं आरियत अहल-ए-हवस शायद
ये जाना चाहते हैं आज दावत में समुंदर की
शायद लालची लोग मेरा दिल उधार माँग रहे हैं, क्योंकि वे आज समुंदर की दावत में जाना चाहते हैं।
9
'असद' जुज़ आब-ए-बख़्शीदन ज़े-दरिया ख़िज़्र को क्या था
डुबोता चश्मा-ए-हैवाँ में गर कश्ती सिकंदर की
ऐ असद, ख़िज़्र के पास नदी से पानी पिलाने के सिवा और क्या था? बेहतर होता अगर वह आब-ए-हयात (अमृत के सोते) में सिकंदर की नाव ही डुबो देते।
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