ग़ज़ल

मत मर्दुमक-ए-दीदा में समझो ये निगाहें

مت مردمکِ دیدہ میں سمجھو یہ نگاہیں
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 8 shers· radif: आहें

यह ग़ज़ल अनकहे भावों और छिपे हुए दुःख की गहरी पड़ताल करती है, यह सुझाव देती है कि मात्र निगाहें हृदय के गहनतम कष्ट को छिपाती हैं। यह प्रेमी की आहों को आत्मा के भीतर निवास करती हुई चित्रित करती है, जो एक तीव्र लालसा और पीड़ा को दर्शाती है जो अस्तित्व के हर कण में व्याप्त है, और आंतरिक घावों के बीच महबूब की अथक खोज को भी दर्शाती है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
मत मर्दुमक-ए-दीदा में समझो ये निगाहें हैं जम्अ सुवैदा-ए-दिल-ए-चश्म में आहें
इन निगाहों को सिर्फ़ आँख की पुतली में मत समझो; ये दिल की आँख के गहरे काले केंद्र में जमा आहें हैं।
2
जूँ मर्दुमक-ए-चश्म से हों जम्अ' निगाहें ख़्वाबीदा ब-हैरत-कदा-ए-दाग़ हैं आहें
जैसे आँख की पुतली में सभी दृष्टियाँ एकत्रित होती हैं, वैसे ही मेरी आहें मेरे दर्द और ज़ख्मों के हैरत-कदे में सोई हुई हैं।
3
फिर हल्क़ा-ए-काकुल में पड़ीं दीद की राहें जूँ दूद फ़राहम हुईं रौज़न में निगाहें
फिर देखने के रास्ते जुल्फों के घेरे में पड़ गए। मेरी निगाहें रौज़न में धुएँ की तरह इकट्ठी हो गईं।
4
पाया सर-ए-हर-ज़र्रा जिगर-गोशा-ए-वहशत हैं दाग़ से मामूर शक़ाइक़ की कुलाहें
प्रत्येक कण के केंद्र में वहशत का एक हृदय-अंश पाया जाता है। शकाइक के फूलों की टोपियाँ इन्हीं दागों से भरी हुई हैं।
5
किस दिल पे है अज़्म-ए-सफ़-ए-मिज़्गान-ए-ख़ुद-आरा आईने के पायाब से उतरी हैं सिपाहें
किस हृदय पर स्वयं को संवारने वाली पलकों की कतार का आक्रमण करने का दृढ़ संकल्प है? सेनाएं दर्पण के उथले जल से उतरी हैं।
6
दैर-ओ-हरम आईना-ए-तकरार-ए-तमन्ना वामांदगी-ए-शौक़ तराशे है पनाहें
दैर-ओ-हरम बार-बार दोहराई जाने वाली तमन्नाओं का आईना हैं। यह शौक़ की थकावट है जो पनाहगाहें तराशती है।
7
ये मतला 'असद' जौहर-ए-अफ़्सून-ए-सुख़न हो गर अर्ज़-ए-तपाक-ए-जिगर-ए-सोख़्ता चाहें
यह मतला, असद, काव्य के जादू का सार बन जाए, यदि लोग जले हुए हृदय की तीव्र भावना या उष्णता व्यक्त करना चाहें।
8
हैरत-कश-ए-यक-जल्वा-ए-मअनी हैं निगाहें खींचूँ हूँ सुवैदा-ए-दिल-ए-चश्म से आहें
मेरी आँखें अर्थ या सत्य की एक झलक के आश्चर्य में लीन हैं। अपनी दृष्टि के गहरे केंद्र से, मैं गहरी आहें खींच रहा हूँ।
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