ये मतला 'असद' जौहर-ए-अफ़्सून-ए-सुख़न हो — मिर्ज़ा ग़ालिब
ये मतला 'असद' जौहर-ए-अफ़्सून-ए-सुख़न हो
गर अर्ज़-ए-तपाक-ए-जिगर-ए-सोख़्ता चाहें
“May this opening verse, Asad, be poetry's charm's soul, If they wish to show the warmth of a heart consumed whole.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
यह मतला, असद, काव्य के जादू का सार बन जाए, यदि लोग जले हुए हृदय की तीव्र भावना या उष्णता व्यक्त करना चाहें।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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